Saturday, October 8, 2011

Scams in India

Scams in India




राष्ट्रमंडल खेल घोटाला - यूपीए-2 के शासनकाल में हुए सबसे बड़े घोटालों में से एक है। एक अनुमान के अनुसार, यह घोटाला करीब अस्सी हजार करोड़ का है। इस घोटाले में राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के तात्कालिक अध्यक्ष सुरेश कलमाडी और उनके सहयोगियों को नाम आया है। इस घोटाले के सिलसिले में सुरेश कलमाडी इन दिनों जेल में हैं। कलमाडी पर खेल आयोजजन में खर्च की राशि बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगा है। 2010 के राष्ट्रमंडल खेल को लेकर राज्यसभा सांसद मणिशंकर अय्यर ने लगातार अपनी सरकार को निशाने पर लिया और इस खेल की आलोचना की।
Source : मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
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२जी स्पेक्ट्रम घोटाला -
केंद्र सरकार के तीन मंत्रियों जिनको त्याग करना पड़ा उनमे सर्व श्री सुरेश कलमाड़ीजी जो कि कामनवेल्थ खेल में ७०,००० हजार करोड़ का खेल किये। दुसरे महारास्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हद जिनको कारगिल शहीदों के लिए बने आवास में ही उलटफेर किया । तीसरे राजा साहब जिन्होंने १ लाख ७६ हजार करोड़ का वारा न्यारा किया। इसप्रकार राजा द्वारा किया गया घोटाला स्वातंत्र भारत का महाघोटाला होने का कीर्तिमान स्थापित किया।


किसी भी विभाग या संगठन में कार्य का एक विशेस ढांचा निर्धारित होता है,टेलीकाम मंत्रालय इसका अपवाद हो गया है। विभाग ने सीएजी कि रिपोर्ट के अनुसार नियमो कि अनदेखी के साथ साथ अनेक उलटफेर किये। २००३ में मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत नीतियों के अनुसार वित्त मंत्रालय को स्पेक्ट्रम के आबंटन और मूल्य निर्धारण में शामिल किया जाना चाहिए । टेलीकाम मंत्रालय ने मंत्रिमंडल के इस फैसले को नजरंदाज तो किया ही आईटी ,वाणिज्य मंत्रालयों सहित योजना आयोग के परामर्शो को कूड़ेदान में डाल दिया । प्रधानमंत्री के सुझावों को हवा कर दिया गया। यह मामला २००८ से चलता चला आ रहा है, जब ९ टेलीकाम कंपनियों ने पूरे भारत में आप्रेसन के लिए १६५८ करोड़ रूपये पर २जी मोबाईल सेवाओं के एयरवेज और लाईसेंस जारी किये थे । लगभग १२२ सर्कलों के लिए लाईसेंस जारी किये गए इतने सस्ते एयरवेज पर जिससे अरबों डालर का नुकसान देश को उठाना पड़ा । स्वान टेलीकाम ने १३ सर्कलों के लाईसेंस आवश्यक स्पेक्ट्रम ३४० मिलियन डालर में ख़रीदे किन्तु ४५ % स्टेक ९०० मिलियन डालर में अरब कि एक कंपनी अतिस्लास को बेच दिया। एक और आवेदक यूनिटेक लाईसेंस फीस ३६५ मिलियन डालर दिए और ६०% स्टेक पर १.३६ बिलियन डालर पर नार्वे कि एक कम्पनी तेल्नेतर को बेच दिया।
इतना ही नहीं सीएजी ने पाया कि स्पेक्ट्रम आबंटन में ७०% से भी अधिक कंपनिया हैं जो नाटो पात्रता कि कसौटी पर खरी उतरती है नही टेलीकाम मंत्रालय के नियम व शर्ते पूरी करती है । रिपोर्ट के अनुसार यूनिटेक अर्थात युनिनार ,स्वान याने अतिस्लत अलएंज जो बाद में अतिस्लत के साथ विलय कर लिया । इन सभी को लाईसेंस प्रदान करने के १२ महीने के अन्दर सभी महानगरो,नगरों और जिला केन्द्रों पर अपनी सेवाएँ शुरू कर देनी थी। जो इन्होंने नहीं किया ,इस कारण ६७९ करोड़ के नुकसान को टेलीकाम विभाग ने वसूला ही नहीं ।
इस पूरे सौदेबाजी में देश के खजाने को १७६,००० हजार करोड़ कि हानि हुई । जब २००१ से अब तक २जी स्पेक्ट्रम कि कीमतों में २० गुना से भी अधिक कि बढ़ोत्तरी हुई है तो आखिर किस आधार पर इसे २००१ कि कीमतों पर नीलामी कि गई? देश के ईमानदार अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते रहे कि हमारे कमुनिकेसन मंत्री राजा ने किसी भी नियम का अतिक्रमण नही किया और भ्रष्ट मंत्री के दोष छिपाते रहे क्यों ?
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आदर्श हाऊसिंग सोसायटी घोटाला मामले में महत्वपूर्ण दस्तावेज शहरी विकास विभाग से लापता -


आदर्श हाऊसिंग सोसायटी घोटाला मामले में महत्वपूर्ण दस्तावेज शहरी विकास विभाग से लापता हैं। पुलिस ने आज यह जानकारी दी।

विभाग के सचिव गुरुदास बाज्पे द्वारा मैरीन ड्राइव पुलिस को बीती रात दस्तावेजों के लापता होने की लिखित शिकायत करने के बाद पुलिस ने इस संबंध में चोरी का मामला दर्ज किया है।

डीसीपी चेरिंग दोरजे ने बताया कि हमने अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। शहरी विकास विभाग के अधिकारियों के अनुसार, आदर्श हाउसिंग सोसायटी से संबंधित दस फाइलों में से कई दस्तावेज लापता हैं। करोड़ों रुपए के इस घोटाले की जाँच कर रही सीबीआई के संज्ञान में यह बात लायी गयी है।

एक वरिष्ठ सीबीआई अधिकारी ने बताया कि विभाग ने हमें आदर्श सोसायटी से संबंधित दस फाइलें सौंपी थी। जाँच के दौरान हमने महसूस किया कि चार नोटिंग पेपर फाइलों में से गायब हैं। हम विभाग के संज्ञान में यह बात लाए। अधिकारी ने बताया कि इन कागजों में राज्य सरकार के अधिकारियों तथा मुख्यमंत्री की टिप्पणियाँ हैं।

दोरजे ने बताया कि जाँच जारी है। हम शहरी विकास विभाग के अधिकारियों से पूछताछ कर रहे हैं। आदर्श हाउसिंग सोसायटी मूल रूप से कारगिल युद्ध के नायकों तथा युद्ध विधवाओं को आवास मुहैया कराने के लिए छह मंजिला इमारत के रूप में बननी थी।
लेकिन इसे कई कानूनों का उल्लंघन करते हुए 31 मंजिला इमारत में बदल दिया गया और इसके फ्लैट नौकरशाहों, राजनेताओं के रिश्तेदारों तथा रक्षा अधिकारियों को आवंटित कर दिए गए।


News Source : Hindi Web Dunia Epaper
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चारा घोटाला
इसे पशुपालन घोटाला ही कहा जाना चाहिए क्योंकि मामला सिर्फ़ चारे का नहीं है. असल में, यह सारा घपला बिहार सरकार के ख़ज़ाने से ग़लत ढंग से पैसे निकालने का है. कई वर्षों में करोड़ों की रक़म पशुपालन विभाग के अधिकारियों और ठेकेदारों ने राजनीतिक मिली-भगत के साथ निकाली है.
घपला रोशनी में धीरे-धीरे आया और जांच के बाद पता चला कि ये सिलसिला वर्षों से चल रहा था. शुरूआत छोटे-मोटे मामलों से हुई लेकिन बात बढ़ते-बढ़ते तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव तक जा पहुंची.


लालू यादव: बुरे फंसे मामला एक-दो करोड़ रूपए से शुरू होकर अब 360 करोड़ रूपए तक जा पहुंचा है और कोई पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि घपला कितनी रक़म का है क्योंकि यह वर्षों से होता रहा है और बिहार में हिसाब रखने में भी भारी गड़बड़ियां हुई हैं.
मामले के जाल में फंसे लालू यादव को इस सिलसिले में जेल जाना पड़ा, उनके ख़िलाफ़ सीबीआई और आयकर की जांच हुई, छापे पड़े और अब भी वे कई मुक़दमों का सामना कर रहे हैं. आय से अधिक संपत्ति के एक मामले में सीबीआई ने राबड़ी देवी को भी अभियुक्त बनाया है.
घपले की पोल बिहार पुलिस ने 1994 में राज्य के गुमला, रांची, पटना, डोरंडा और लोहरदगा जैसे कई कोषागारों से फर्ज़ी बिलों के ज़रिए करोड़ों रूपए की कथित अवैध निकासी के मामले दर्ज किए.रातो-रात सरकारी कोषागार और पशुपालन विभाग के कई सौ कर्मचारी गिरफ़्तार कर लिए गए, कई ठेकेदारों और सप्लायरों को हिरासत में लिया गया और राज्य भर में दर्जन भर आपराधिक मुक़दमे दर्ज किए गए.
राब़ड़ी देवी भी लपेटे में लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं हुई, राज्य के विपक्षी दलों ने मांग उठाई कि घोटाले के आकार और राजनीतिक मिली-भगत को देखते हुए इसकी जांच सीबीआई से कराई जाए.सीबीआई ने मामले की जांच की कमान संयुक्त निदेशक यू एन विश्वास को सौंपी और यहीं से जांच का रुख़ बदल गया.
शातिर कारगुज़ारी सीबीआई ने अपनी शुरुआती जांच के बाद कहा कि मामला उतना सीधा-सादा नहीं है जितना बिहार सरकार बता रही है.सीबीआई का कहना है कि चारा घोटाले में शामिल सभी बड़े अभियुक्तों के संबंध राष्ट्रीय जनता दल और दूसरी पार्टियों के शीर्ष नेताओं से रहे हैं और उसके पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि काली कमाई का हिस्सा नेताओं की झोली में भी गया है. सीबीआई के अनुसार, राज्य के ख़ज़ाने से पैसा कुछ इस तरह निकाला गया- पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने चारे, पशुओं की दवा आदि की सप्लाई के मद में करोड़ों रूपए के फ़र्जी बिल कोषागारों से वर्षों तक नियमित रूप से भुनाए.
विपक्ष ने चुनावी मुद्दा बनाया जांच अधिकारियों का कहना है कि बिहार के मुख्य लेखा परीक्षक ने इसकी जानकारी राज्य सरकार को समय-समय पर भेजी थी लेकिन बिहार सरकार ने इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया.
राज्य सरकार की वित्तीय अनियमितताओं का हाल ये है कि कई-कई वर्षों तक विधानसभा से बजट पारित नहीं हुआ और राज्य का सारा काम लेखा अनुदान के सहारे चलता रहा है.
सीबीआई का कहना है कि उसके पास इस बात के दस्तावेज़ी सबूत हैं कि तत्कालीन मुख्यमंत्री को न सिर्फ़ इस मामले की पूरी जानकारी थी बल्कि उन्होंने कई मौक़ों पर राज्य के वित्त मंत्रालय के प्रभारी के रूप में इन निकासियों की अनुमति दी थी.
जांच के दौरान सीबीआई ने ये दावा भी किया लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी अपनी घोषित आय से अधिक संपत्ति रखने के दोषी हैं.
व्यापक षड्यंत्र सीबीआई का कहना रहा है कि ये सामान्य आर्थिक भ्रष्टाचार का नहीं बल्कि व्यापक षड्यंत्र का मामला है जिसमें राज्य के कर्मचारी, नेता और व्यापारी वर्ग समान रूप से भागीदार है. मामला सिर्फ़ राष्ट्रीय जनता दल तक सीमित नहीं रहा. इस सिलसिले में बिहार के एक और पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर जगन्नाथ मिश्र को गिरफ़्तार किया गया. राज्य के कई और मंत्री भी गिरफ़्तार किए गए. सीबीआई के कमान संभालते ही बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां हुईं और छापे मारे गए. लालू प्रसाद यादव के ख़िलाफ़ सीबीआई ने आरोप पत्र दाख़िल कर दिया जिसके बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा और बाद में सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिलने तक वे कई महीनों तक जेल में रहे. मामले के तेज़ी से निबटारे में बहुत सारी बाधाएं आईं. पहले तो इसी पर लंबी क़ानूनी बहस चलती रही कि बिहार से अलग होकर बने झारखंड राज्य के मामलों की सुनवाई पटना हाईकोर्ट में होगी या रांची हाईकोर्ट में.
सीबीआई ने ज़्यादातर मामलों में आरोप पत्र दाख़िल कर दिए हैं और जांच समाप्त हो गई है लेकिन मुक़दमों की सुनवाई शुरू होने में अभी वक्त लगेगा


source : मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
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बोफोर्स घोटाला -
सन् १९८७ में यह बात सामने आयी थी कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 80 लाख डालर की दलाली चुकायी थी। उस समय केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। स्वीडन की रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया। इसे ही बोफोर्स घोटाला या बोफोर्स काण्ड के नाम से जाना जाता है।
आरोप : -
आरोप था कि राजीव गांधी परिवार के नजदीकी बताये जाने वाले इतालवी व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोक्की ने इस मामले में बिचौलिये की भूमिका अदा की, जिसके बदले में उसे दलाली की रकम का बड़ा हिस्सा मिला। कुल चार सौ बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा 1.3 अरब डालर का था। आरोप है कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारत के साथ सौदे के लिए 1.42 करोड़ डालर की रिश्वत बांटी थी।


इतिहास : -
काफी समय तक राजीव गांधी का नाम भी इस मामले के अभियुक्तों की सूची में शामिल रहा लेकिन उनकी मौत के बाद नाम फाइल से हटा दिया गया। सीबीआई को इस मामले की जांच सौंपी गयी लेकिन सरकारें बदलने पर सीबीआई की जांच की दिशा भी लगातार बदलती रही। एक दौर था, जब जोगिन्दर सिंह सीबीआई चीफ थे तो एजेंसी स्वीडन से महत्वपूर्ण दस्तावेज लाने में सफल हो गयी थी। जोगिन्दर सिंह ने तब दावा किया था कि केस सुलझा लिया गया है। बस, देरी है तो क्वात्रोक्की को प्रत्यर्पण कर भारत लाकर अदालत में पेश करने की। उनके हटने के बाद सीबीआई की चाल ही बदल गयी। इस बीच कई ऐसे दांवपेंच खेले गये कि क्वात्रोक्की को राहत मिलती गयी। दिल्ली की एक अदालत ने हिंदुजा बंधुओं को रिहा किया तो सीबीआई ने लंदन की अदालत से कह दिया कि क्वात्रोक्की के खिलाफ कोई सबूत ही नहीं हैं। अदालत ने क्वात्रोक्की के सील खातों को खोलने के आदेश जारी कर दिये। नतीजतन क्वात्रोक्की ने रातों-रात उन खातों से पैसा निकाल लिया।
2007 में रेड कार्नर नोटिस के बल पर ही क्वात्रोक्की को अर्जेन्टिना पुलिस ने गिरफ्तार किया। वह बीस-पच्चीस दिन तक पुलिस की हिरासत में रहा। सीबीआई ने काफी समय बाद इसका खुलासा किया। सीबीआई ने उसके प्रत्यर्पण के लिए वहां की कोर्ट में काफी देर से अर्जी दाखिल की। तकनीकी आधार पर उस अर्जी को खारिज कर दिया गया, लेकिन सीबीआई ने उसके खिलाफ वहां की ऊंची अदालत में जाना मुनासिब नहीं समझा। नतीजतन क्वात्रोक्की जमानत पर रिहा होकर अपने देश इटली चला गया। पिछले बारह साल से वह इंटरपोल के रेड कार्नर नोटिस की सूची में है। सीबीआई अगर उसका नाम इस सूची से हटाने की अपील करने जा रही है तो इसका सीधा सा मतलब यही है कि कानून मंत्रालय, अटार्नी जनरल और सीबीआई क्वात्रोक्की को बोफोर्स मामले में दलाली खाने के मामले में क्लीन चिट देने जा रही है।
यह ऐसा मसला है, जिस पर 1989 में राजीव गांधी की सरकार चली गयी थी। विश्वनाथ प्रताप सिंह हीरो के तौर पर उभरे थे। यह अलग बात है कि उनकी सरकार भी बोफोर्स दलाली का सच सामने लाने में विफल रही थी। बाद में भी समय-समय पर यह मुद्दा देश में राजनीतिक तूफान लाता रहा। इस प्रकरण के सामने-आते ही जिस तरह की राजनीतिक हलचल शुरू हुई, उससे साफ है कि बोफोर्स दलाली आज भी भारत में बड़ा राजनीतिक मुद्दा है।


News Source : http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%AB%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B8_%E0%A4%98%E0%A5%8B%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE
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तेलगी को स्टाम्प घोटाले में दस साल की सजा
अरबों रुपए के फर्जी स्टाम्प पेपर घोटाले के मुख्य षडयंत्रकर्ता अब्दुल करीम तेलगी को यहां की एक विशेष अदालत ने बुधवार को दोषी करार देते हुए उसे दस वर्ष कैद की सजा सुनाई।


न्यायाधीश चन्द्रशेखर पाटिल ने उपारपेट पुलिस द्वारा वर्ष 2003 में तेलगी और 32 अन्य के खिलाफ दायर पहले मामले पर सजा सुनाते हुए तेलगी पर 50 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया। न्यायाधीश ने तेलगी के 21 सहयोगियों को सात-सात वर्ष कैद की सजा के अलावा दस-दस हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया।


न्यायाधीश ने इस मामले में पूर्व मंत्री और कांग्रेसी नेता रोशन बेग के भाई रेहान बेग समेत 11 लोगों को बरी कर दिया।


यह घोटाला उस समय सामने आया था जब पुलिस ने तेलगी के सहयोगी बदरूदीन को फर्जी स्टाम्प पेपरों को ले जाते समय गिरफ्तार किया था। इस बीच तेलगी के वकील शंकराप्पा ने कहा कि वह विशेष अदालत के निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करेंगे।


Scam is too big and where has money gone. Penalty of Rs. 50000/-?
In India where so many farmers doing sucide due to petty amount, so many children lives in slums , below poverty line (BPL).
Question is of money and its recovery. Is the money in Swiss Bank ?
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गोवा खनन घोटाला : पीएसी अध्यक्ष पद से पर्रिकर हटाए गए


पणजी। गोवा में 3,500 करोड़ रुपये के कथित अवैध खनन घोटाले में शुक्रवार देर शाम एक नया मोड़ आ गया। विधानसभा अध्यक्ष प्रतापसिंह राणे ने लोक लेखा समिति (पीएसी) के अध्यक्ष मनोहर पर्रिकर को उनके पद से हटा दिया। पीएसी की रिपोर्ट सदन के पटल पर न रखे जाने से नाराज विपक्ष के नेता एवं समिति के अध्यक्ष पर्रिकर ने राणे पर कांग्रेस से मिलीभगत का आरोप लगाया।


यह आदेश शुक्रवार शाम तब जारी किया गया जब पर्रिकर ने राणे पर कांग्रेस का पक्ष लेने तथा गोवा के कई हजार करोड़ रुपये के अवैध खनन घोटाले में संलिप्त एक ऐसे व्यक्ति को बचाने का आरोप लगाया जिसके खिलाफ पीएसी ने दस्तावेज जुटाए हैं।


पर्रिकर का कहना है कि जब उन्होंने बुधवार को ही रिपोर्ट सौंप दी थी तो इसे सदन पटल पर रखे जाने से रोकना विधानसभा अध्यक्ष प्रतापसिंह राणे के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।


पर्रिकर ने कहा, "आप रिपोर्ट को पेश करना नहीं चाहते हैं। हम बहिर्गमन कर रहे हैं क्योंकि हम किसी भी गैर कानूनी काम के भागीदार नहीं बनना चाहते।"


पर्रिकर ने विधानसभा अध्यक्ष पर राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, "कांग्रेस के 75 प्रतिशत विधायक अवैध खनन में संलिप्त हैं।"


पर्रिकर ने पत्रकारों से कहा, "विधानसभा अध्यक्ष सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि वह किसी को बचाने का प्रयास कर रहे हैं।"


रिपोर्ट को सदन में पेश करने से इंकार करते हुए राणे ने कहा, "रिपोर्ट की बारीकी से जांच करना मेरी जिम्मेदारी है। यदि यह नियमों के अनुरूप नहीं होगी तो इस तरह की रिपोर्ट पेश नहीं की जा सकती। उन्हें इसके लिए कार्यक्रम बनाना चाहिए था। मुझे इस रिपोर्ट को पढ़ना पड़ेगा।"


राणे ने कहा कि पीएसी के सात सदस्यों में से सत्तारूढ़ कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) गठबंधन के चार सदस्यों ने रिपोर्ट पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।


इन चार विधायकों ने मंगलवार को यह कहकर रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था कि उन्हें पहले दस्तावेज का अध्ययन करना होगा।


रिपोर्ट में राज्य सरकार की कई एजेंसियां जांच के घेरे में आई हैं। इनमें खनन विभाग, प्रदूषण नियंत्रण विभाग, वन विभाग व पुलिस विभाग शामिल हैं। इनके अलावा केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारतीय खनन ब्यूरो और खनन सुरक्षा महानिदेशालय पर भी गोवा में हुए अवैध खनन की अनदेखी करने का आरोप लगाया गया है।


बुधवार को पीएसी की रिपोर्ट अध्यक्ष को सौंपे जाने के कुछ घंटे बाद पर्रिकर ने विधानसभा में अवैध खनन घोटाले की जिम्मेदारी अपरोक्ष रूप से कामत पर डाली थी।


पर्रिकर ने कहा, "क्या मुख्यमंत्री खनन विभाग की स्थिति को बदलना नहीं चाहते। क्या वह दोषियों को सजा दिलवाना नहीं चाहते। क्या कोई तीसरा व्यक्ति इस बात का अनुमान लगाएगा कि वह इसमें शामिल थे।"


उन्होंने कहा, "जब वह मुख्यमंत्री थे तब निर्यात 1.6 करोड़ टन से बढ़कर 5.4 करोड़ टन हो गया था..खनन में अब तीन गुना की वृद्धि हो गई है। करीब तीन करोड़ टन अयस्क का उत्पादन वैध है जबकि दो करोड़ टन खनन वैध नहीं है।"


इस बीच, भाजपा ने आरोप लगाया कि राज्य में हजारों करोड़ रुपये के अवैध खनन घोटाले का लाभ पाने वालों में मुख्यमंत्री दिगम्बर कामत सहित कई वरिष्ठ कांग्रेस नेता शामिल हैं।


भाजपा के राष्ट्रीय सचिव किरीट सोमैया ने कहा कि नई दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में पदस्थ एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता भी इस घोटाले में शामिल हैं।


पूर्व सांसद सोमैया ने कहा, "मात्र दो साल में 25,000 करोड़ रुपये का घोटाला भारत का सबसे बड़ा अवैध खनन घोटाला है। 2जी घोटाले की तरह इस घोटाले में धन विभिन्न कम्पनियों के माध्यम से आया। ये कम्पनियां कर बचाने की दृष्टि से स्वर्ग माने जाने वाले मॉरीशस और साइमन द्वीपों पर हैं।"


एक दशक से अधिक समय तक गोवा के खनन मंत्री रहे कामत की ओर इशारा करते हुए सोमैया ने इस घोटाले के सिलसिले में कई अन्य नेताओं तथा राज्य के मंत्रियों के नाम भी लिए।


News Source : http://www.merikhabar.com/News/BJPs_Parrikar_removed_from_Goa_PAC_after_mining_report_%E2%80%8E_N44189.html
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